2003 के विश्व कप के बाद साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम एक गहरे उथल-पुथल से गुजर रही थी। यह वह दौर था जब टीम ने एक के बाद एक झटके खाए। 2002 में श्रीलंका में हुए आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के सेमीफाइनल में उन्हें सिर्फ 10 रन से हार झेलनी पड़ी। इसके बाद 2003 वर्ल्ड कप, जो उनके अपने घर में आयोजित हुआ और पूरे देश की उम्मीदें टीम पर थीं। लेकिन श्रीलंका के खिलाफ ग्रुप स्टेज का करो या मरो के मुकाबला में एक गलत डकवर्थ-लुइस कैलकुलेशन की वजह से मैच टाई हो गया और नतीजा ऐसा हुआ कि मेजबान टीम टूर्नामेंट से बाहर हो गई।
अगले साल श्रीलंका के दौरे पर टेस्ट और ODI में करारी हार झेलनी पड़ी तथा कुछ महीने बाद भारत में भी 1-0 से टेस्ट सीरीज गंवानी पड़ी। पिछले दो सालों में टीम में इतने बदलाव हुए कि मानो यह पूरी तरह नई टीम हो। दो कोच (ग्राहम फोर्ड और एरिक साइमंस) बदले गए, प्रमुख खिलाड़ियों को हटाया गया, कप्तान शॉन पोलॉक को बदलकर युवा ग्रैमी स्मिथ को कमान सौंपी गई और कुछ दिग्गज खिलाड़ी रिटायर हो गए।
यह एक ऐसे दौर की शुरुआत थी जब साउथ अफ्रीका को फिर से खड़ा करने के लिए नई ऊर्जा, नई सोच और नए खिलाड़ियों की जरूरत थी। इस समय टीम में कुछ चेहरे शामिल हुए जो बाद में दिग्गज बने और वो नाम थे हाशिम आमला, डेल स्टेन, और एक नाम अब्राहम बेंजामिन डिविलियर्स जिसने क्रिकेट की परिभाषा ही बदल दी।
एबी डिविलियर्स का बचपन और उनके सपने
17 फरवरी 1984, प्रिटोरिया, साउथ अफ्रीका में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे एबी डिविलियर्स के पिता पेशे से डॉक्टर थे और खेलों से गहरा लगाव रखते थे। उनकी मां एक प्रॉपर्टी डीलर थीं तथा उनके घर का माहौल खेलों को बढ़ावा देने वाला था, और फिटनेस पर विशेष ध्यान दिया जाता था। एबी बचपन से ही बहु-प्रतिभाशाली थे और वे क्रिकेट, रग्बी, टेनिस, स्विमिंग, यहां तक कि हॉकी में भी बेहतरीन थे।
स्कूल के दिनों में वे रग्बी और क्रिकेट टीम के स्टार खिलाड़ी थे। 11 साल की उम्र में उनके पिता उन्हें सुपर स्पोर्ट पार्क स्टेडियम टेस्ट मैच दिखाने ले गए जहां उन्होंने जोंटी रोड्स को नेट प्रैक्टिस करते देखा। हरे रंग की कैप पर साउथ अफ्रीका का झंडा देखकर उनके मन में ठान लिया कि एक दिन मैं भी अपने देश के लिए खेलूँगा। जल्दी ही उनकी प्रतिभा पहचानी गई और वे साउथ अफ्रीका अंडर-19 टीम में शामिल हुए। 2003 में इंग्लैंड के खिलाफ युवा सीरीज में उन्होंने 202 रन बनाए और राष्ट्रीय चयनकर्ताओं की नजर में आ गए।
अवसरों के दो रास्तों के बीच कोई एक चुनना भी आसान काम नहीं।
2004 में साउथ अफ्रीका के क्रिकेट में बदलाव का दौर था और पुराने खिलाड़ियों की जगह नई प्रतिभाओं को मौका दिया जा रहा था। इसी दौरान 19 साल के एबी डिविलियर्स के सामने दो रास्ते थे कि या तो वे पिता की तरह डॉक्टर बनें या क्रिकेट में करियर बनाएं, लेकिन उन्होंने क्रिकेट चुना। 5 दिसंबर 2004 को इंग्लैंड के खिलाफ पोर्ट एलिज़ाबेथ टेस्ट में उन्होंने और डेल स्टेन ने अपना डेब्यू किया। शुरुआती पारियों में उनका प्रदर्शन औसत था, लेकिन कप्तान ग्रैमी स्मिथ ने उन पर भरोसा बनाए रखा। पांचवें टेस्ट में उन्होंने शानदार 109 रन की पारी खेलकर सभी को चौंका दिया।
पदार्पण के बाद तुरंत विवाद का सामना भी करना पड़ा।
टेस्ट डेब्यू के तुरंत बाद ही चयन विवाद भी हुआ। हारून लोर्गट ने ODI टीम में उनका चयन नहीं किया, जिससे कप्तान नाराज हुए और दबाव में दूसरे मैच में उन्हें शामिल किया गया। ODI डेब्यू (2 फरवरी 2005) में वे सिर्फ 20 रन ही बना पाए, लेकिन उनकी फील्डिंग और टीम स्पिरिट ने सबको प्रभावित किया। 2006 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनका किया रन आउट आज भी वनडे इतिहास के बेहतरीन पलों में गिना जाता है।
असफलता से मिली सीख और किए बदलाव
2008 का एशिया दौरा उनके लिए मुश्किल साबित हुआ जिसमें भारत के तेज गेंदबाज श्रीसंत और पाकिस्तान के मोहम्मद आसिफ ने उन्हें कई बार परेशान किया। इस असफलता के बाद उन्होंने अपने तकनीक पर गहराई से काम किया तथा गेंद को आखिरी समय तक देखना और लेट खेलना सीखा।
2009 में एक विवादास्पद कैच पर उन्होंने ईमानदारी दिखाई और खुद कहा कि गेंद जमीन पर लगी थी। इससे उनकी खेल भावना की सराहना हुई, लेकिन उन्हें यह भी एहसास हुआ कि मानसिक मजबूती क्रिकेट में कितनी जरूरी है।
मिस्टर 360° का उदय और एक महान क्रिकेटर बनने की ओर कदम।
धीरे-धीरे एबी डिविलियर्स सिर्फ बल्लेबाज नहीं, बल्कि एक कंप्लीट क्रिकेटर बन गए। टेस्ट में अहमदाबाद की पारी (217 रन) ने उनकी लंबी पारी खेलने की क्षमता दिखाई, तो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 220 गेंद में 33 रन बनाकर मैच बचाने की कला भी दिखाई।
2012 में विकेटकीपर मार्क बाउचर के अचानक रिटायर होने के बाद एबी ने कप्तानी और विकेटकीपिंग दोनों संभाली। पहले ही मैच में श्रीलंका को 43 रन पर ऑलआउट कर दिया। ODI में उन्होंने रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड तोड़े और 18 जनवरी 2015 को वेस्टइंडीज के खिलाफ सिर्फ 16 गेंदों पर अर्धशतक और 31 गेंदों में शतक बनाकर दुनिया को हैरान कर दिया।
2015 वर्ल्ड कप में रह गया सपना अधूरा
2015 का वर्ल्ड कप उनके करियर का अहम मोड़ था। इस टूर्नामेंट में उन्होंने 8 मैचों में 483 रन बनाए और वेस्टइंडीज के खिलाफ सबसे तेज़ शतक का रिकॉर्ड बनाया। साउथ अफ्रीका पहली बार फाइनल में पहुंचने से सिर्फ एक कदम दूर थी, लेकिन सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार गई। इस मैच में कई आसान कैच छूटे, रन आउट के मौके गंवाए और टीम का सपना टूट गया। मैच के बाद एबी की आंखों में आंसू थे और यह तस्वीर आज भी करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के दिल में बसी है।
एबी के करियर के आखिरी पड़ाव और आईपीएल की कहानी
2018 में उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया, लेकिन IPL में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) के लिए खेलते रहे। विराट कोहली के साथ उनकी साझेदारियां क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक उत्सव बन गईं। चाहे छक्कों की बरसात हो, या असंभव कैच पकड़ना हो एबी हर मैच में दर्शकों को कुछ खास देते थे। 19 नवंबर 2021 को उन्होंने क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से रिटायरमेंट की घोषणा कर दिए लेकिन आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोग उन्हें मिस्टर 360° के नाम से याद करते हैं। वह खिलाड़ी जो सिर्फ रन नहीं बनाता था, बल्कि खेल को एक कला में बदल देता था।
एबी डिविलियर्स सिर्फ एक क्रिकेटर ही नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत, आत्मविश्वास और खेल भावना की मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर आपका इरादा मजबूत हो तो आप सफलता के उच्च शिखर तक पहुंच सकते हैं। वो सिर्फ क्रिकेट के मैदान में ही जीत हासिल नहीं किए, बल्कि करोड़ो क्रिकेटप्रेमियों के दिलों को भी जीते हैं। यही कारण है कि जब भी क्रिकेट इतिहास में सबसे बेहतरीन और मनोरंजक खिलाड़ियों की चर्चा होगी तो एबी डिविलियर्स का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।



