भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है जहां वह पूरी दुनिया में केवल संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) चीन, और जर्मनी से पीछे है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत न केवल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है, बल्कि आने वाले वर्षों में भी काफी तेजी से प्रगति करता रहेगा। ये बात S&P ग्लोबल रिटेल की रिपोर्ट में भी कही गई है।
दावा और सच्चाई की सही तस्वीर क्या है ?
भारत की इसी निरंतर आर्थिक वृद्धि को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये दावा किया कि वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इस दावे की पुष्टि IMF के डेटा से भी होती है, जिसके अनुसार 2027 तक भारत की जीडीपी जर्मनी को पीछे छोड़ सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति हर वर्ष बेहतर होती जा रही है।
लेकिन अगर हम कुछ देर के लिए आर्थिक शक्ति की इस चमक से हटकर, भारत की स्थिति प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के आधार पर देखें तो तस्वीर पूरी तरह से बदल जाती है। 2023 में पूर्व आरबीआई गवर्नर सी. रंगराजन ने अपने एक व्याख्यान में बताया कि प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से भारत 197 देशों में से 140वें स्थान पर है और यह आंकड़ा IMF के डेटा से भी मेल खाता है। यहाँ तक कि 2021 के IMF आंकड़ों के अनुसार भारत ने भले ही ब्रिटेन को कुल जीडीपी में पीछे छोड़ दिया हो लेकिन औसत भारतीय की आय मात्र $2,283 थी, जबकि औसत ब्रिटिश नागरिक की आय $47,000 यानी लगभग 20 गुना अधिक थी।
आइए जानते हैं भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है फिर भी आम भारतीय गरीब क्यों है ?
आसान भाषा में कहें तो किसी देश में एक निश्चित अवधि (जैसे एक साल) में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं ( जैसे कृषि ,सेवा या उद्योग) की कुल कीमत को GDP या Gross Domestic Product कहते हैं। और जब इस कुल GDP को देश की जनसंख्या से विभाजित किया जाता है, तो उसे Per Capita GDP यानी प्रति व्यक्ति आय कहा जाता है।2023 के बजट में केंद्र सरकार ने बताया कि पिछले 9 वर्षों में भारत की प्रति व्यक्ति आय 2014 की तुलना में लगभग दोगुनी हो चुकी है। लेकिन अगर पिछले आंकड़ों की तुलना की जाए तो पता चलता है कि यूपीए सरकार के दौरान (2004-2014) यह वृद्धि 259% थी। यानी 2004 से अब तक एक भारतीय की औसत आय कई गुना बढ़ चुकी होनी चाहिए थी।
भारत प्रति व्यक्ति आय में इतने पीछे क्यों है ?
इसका कारण यह है कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में मुद्रास्फीति (महंगाई) को ध्यान में नहीं रखा गया है। यानी तुलना करते समय पुराने आंकड़ों को मुद्रास्फीति समायोजित (inflation-adjusted) नहीं किया गया, बल्कि मौजूदा कीमतों से तुलना की गई।उदाहरण के लिए अगर 2004 में आपकी वार्षिक आय ₹50,000 थी और खर्च ₹40,000 और 2023 में आपकी आय ₹5 लाख हो गई लेकिन खर्च भी ₹4 लाख हो गया तो भले ही आय 10 गुना बढ़ी हो, असल में बचत और क्रयशक्ति उतनी नहीं बढ़ी।
द प्रिंट ने जब इस आंकड़े को मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित किया तो पाया कि 2004-14 के दौरान प्रति व्यक्ति आय 1.5 गुना बढ़ी थी, जबकि 2014-23 के दौरान यह वृद्धि मात्र 1.4 गुना रही जबकि इसमें कोविड जैसे महामारी के वर्ष भी शामिल थे। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही भारत की कुल GDP दुनिया में पांचवें स्थान पर हो, परंतु प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अभी भी “लो इनकम कंट्री” की श्रेणी में आता है। IMF के अनुसार, उभरते बाजारों (Emerging Markets) में भी भारत की रैंकिंग नीचे है। तुलना करें तो चीन 2000 में 17वें स्थान पर था, और 2023 में 9वें स्थान पर पहुंच गया है। इसके पीछे एक बड़ा कारण ये भी है कि अलग-अलग देशों में महंगाई दर और जीवन स्तर अलग होते हैं। इसलिए Purchasing Power Parity (PPP) की अवधारणा आती है, जो किसी देश की वास्तविक क्रयशक्ति को दिखाती है।
क्या भारतीय वास्तव में अमीर हो रहे हैं या सिर्फ कुछ ही लोग आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं !
ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट “Survival of the Richest: The Indian Story” के अनुसार, भारत के शीर्ष 1% अमीर लोगों के पास देश की 40% से अधिक संपत्ति है, जबकि 99% जनता के पास कुल संपत्ति का बहुत ही सीमित हिस्सा है। इसी रिपोर्ट की माने तो 2020 से 2022 के बीच देश में अरबपतियों की संख्या 110 से बढ़कर 166 हो गई है, और टॉप 100 सबसे अमीर लोगों की कुल संपत्ति ₹54.12 लाख करोड़ हो चुकी है।
2022 की वर्ल्ड इनएक्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया के आर्थिक रूप से सबसे असमान देशों में से एक है। यहां देश की निचली 50% आबादी की औसत आय ₹53,000 है, जबकि शीर्ष 10% की औसत आय ₹11.6 लाख यानी 20 गुना अधिक है। ये असमानता केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय (Regional) असमानता भी उतनी ही गंभीर है।
2022-23 के अनुसार, हरियाणा में प्रति व्यक्ति आय ₹1.01 लाख थी, जबकि मध्यप्रदेश में ₹65,000 और बिहार में महज ₹30,000। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार ग्रामीण भारत की 54% जनसंख्या गरीब मानी जाती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या मात्र 10.4% है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में प्रति व्यक्ति आय ₹4 से ₹6 लाख तक पहुँच चुकी है जो यह बताता है कि समृद्धि कुछ विशेष क्षेत्रों और वर्गों तक ही सीमित है।
राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा था कि “देश में दो भारत बन गए हैं– एक अमीरों के लिए और दूसरा गरीबों के लिए।”वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा था– India is a rich country with poor population.
आर्थिक असमानता का समाधान क्या है ?
अर्थशास्त्र के अनुसार अगर असमानता को कम करना है तो सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा खर्च करना चाहिए। कई देश (जैसे नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क आदि) ने उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक सेवाओं, प्रगतिशील कर नीति और सामाजिक एकजुटता के माध्यम से समानता प्राप्त की है। भारत को भी इसी दिशा में बढ़ना होगा और विशेषकर नीति आयोग द्वारा चिन्हित पिछड़े क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता है। इन मुहीम को फंड करने के लिए वेल्थ टैक्स जैसे कदमों पर भी विचार किया जा रहा है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत के अरबपतियों पर केवल 2% टैक्स लगाया जाए तो देश की न्यूट्रिशन स्कीम्स को तीन वर्षों तक फंड किया जा सकता है। और सिर्फ 1% टैक्स से नेशनल हेल्थ मिशन को डेढ़ वर्ष तक चलाया जा सकता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ वेल्थ टैक्स को भारत के स्टार्टअप और बिजनेस इकोसिस्टम के लिए नकारात्मक मानते हैं फिर भी यह एक प्रभावी समाधान हो सकता है।
सरकार इस असमानता के खिलाफ लड़ाई को किस तरह और कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाती है ये देखने योग्य है।



